क्रिकेट का बदलता स्वरुप और चिंता

क्रिकेट में बदलाव क्रिकेट के अस्तित्व के लिए खतरा है या यह समय की जरूरत है। यह रिपोर्ट पढ़िए।

क्रिकेट का बदलता स्वरुप और चिंता

भारत जैसे देश में क्रिकेट को लेकर जो दीवानगी है वो किसी से छुपी नहीं है। हम अपनी सुविधा अनुसार कहीं भी क्रिकेट खेलने लग जाते हैं, देखने लग जाते हैं। एक नया नशा जो हाल के दिनों में चढ़ा है वो है आधिकारिक रूप से जुआ खेलने का जिसके लिए कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हो चले हैं।

विश्व क्रिकेट में हाल के दिनों में नए नए प्रयोग हो रहे हैं पर जब क्रिकेट का जन्म हुआ तो क्रिकेट का उदेश्य केवल मनोरंजन था। वर्तमान में क्रिकेट का व्यवसायीकरण हो चुका है जिसमें क्रिकेट खेलने के अलावे सारा कुछ उसी व्यवसाय का हिस्सा है। कोई क्रिकेटर अपना जुनून इस खेल में लाता है और जब कोई बोर्ड या नियंत्रक उन खिलाड़ियों से विभिन्न तरीके के उत्पादों और ब्रांडों के प्रचार करवाता है तो ये अपने आप में एक गंभीर सवाल खड़े करता है। ये दुःख की बात है कि भद्र जनों का खेल कहलाने वाला क्रिकेट आज आक्रमकता का पर्याय बन चुका है।

हाल ही में एक नया क्रिकेट समारोह शुरू हुआ है जिसे 'The Hundred' नाम दिया गया है। इसे ECB द्वारा प्रोत्साहित एवं आयोजित किया जा रहा है। इसे समारोह कहने के पीछे तर्क सिर्फ इतना सा है कि यह अपने आप में प्रतियोगिता के नाम पर मजाक जैसा है।  इस समारोह में आयोजित होने वाले मैच 100 गेंदों/ प्रति पारी होंगे और कोई गेंदबाज अधिकतम 20 गेंद फेंक सकता है।

क्रिकेट का जन्म भले ही ब्रिटेन में हुआ लेकिन आज यह 100 से अधिक देशों में खेला जाता है। आप में से बहुतों को टेस्ट मैचों की रेडियो कमेन्ट्री याद होगी। वो दौर जब वेस्टइंडीज की क्रिकेट टीम अपने स्वर्णिम दौर में थी। वो दौर विश्व के कई महान बल्लेबाजों के लिए भी स्वर्णिम था। मैं उस दौर की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि वो सही मायनों में क्रिकेट पर केंद्रित दौर था।

1970 का दशक जो क्रिकेट के लिहाज से एक व्यापक बदलाव लेकर आया और उस बदलाव के नायक (विलेन भी) थे 'कैरी पार्कर'। कैरी पार्कर एक मीडिया टायकून थे जो चैनल - 9 के मालिक थे। इस बदलाव से थोड़े समय पहले 1971 में एकदिवसीय क्रिकेट शुरू हो चुका था लेकिन इसके बहुत से नियम या व्यवसायिक पहलू कैरी पार्कर के वर्ल्ड लीग प्रतियोगिता के बाद विश्व क्रिकेट में शामिल हुए। इसका असर क्रिकेट पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूप से पड़ा। क्रिकेट अब रंगीन हो गया, दिन-रात के मैच भी आयोजित होने लगे और सबसे महत्वपूर्ण बात कि इस बात को सभी ने समझ लिया कि क्रिकेट से करोड़ों कमाए जा सकते हैं। यही से क्रिकेट का व्यवसायीकरण शुरू हुआ।

इसी क्रम में जब T-20 मैचों की शुरुआत हुई तो हम जैसे क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह एक नया अनुभव था। क्रिकेट के इस विकृत रूप को देखना अपने आप में अजीब था। ये वो दौर था जब 90 के दशक के तमाम बेहतरीन खिलाड़ी अपने अवसान पर थे। क्रिकेट के इस व्यवसायीकरण में भारत में एक दफे एक विद्रोह 'ICL' भी देखने को मिला, जिसने बाद में आईपीएल को जन्म दे दिया।आईपीएल, के तर्ज़ पर आज देश के बाहर ऐसे कई समारोह आयोजित होने लगे हैं जो क्रिकेट के घरेलु टूर्नामेंटों से ज्यादा महत्व पाने लगे हैं।

आईपीएल को आज व्यवसायिक से ज्यादा इस बात के लिए महत्वपूर्ण समझा जाने लगा है कि इससे खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मैचों में खेलने का मौका मिलता है। अगर आँकड़ों को देखे तो हार साल आईपीएल कुछ 200-300 क्रिकेटर भाग लेते हैं। इनमें से लगभग आधे नए होते हैं। अगर हर नये खिलाड़ी को भी मौका मिलता है तो ये आंकड़ा महज 100-150 तक ही पहुँचता है। भारत के घरेलु टूर्नामेंटों की बात करे तो रणजी ट्रॉफी, विजय हज़ारे, वीनू मांकड ट्रॉफी जैसे घरेलु टूर्नामेंट में हज़ारों खिलाड़ी खेलते हैं और सालों पसीना बहाते हैं जो कि उनकी प्रतिभा के चयन की उचित जगह है।

टेस्ट, वन डे, T-20,10-10, The Hundred के बाद हो सकता है आने वाले सालों में एक ऐसा क्रिकेट समारोह भी आए जिसमें हर एक खिलाड़ी को एक ओवर बल्लेबाजी और एक ओवर गेंदबाजी करनी पड़े।

अब यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्रिकेट के इस बदलाव से सबसे अधिक नुकसान किसका है?

मेरी राय में सबसे अधिक नुकसान इस खेल का हो रहा है। क्रिकेटर अब परिपक्वता की जगह आक्रमकता को तरजीह दे रहे हैं, जिस वज़ह से उनकी क्रिकेट आयु कम हो जाती है। आजकल टेस्ट मैच 5 दिन मुश्किल से चल पाते हैं। वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम एक समय विश्व की सर्वश्रेष्ठ टीम थी लेकिन आज उसका हाल बहुत बुरा है और वो बस एक T-20 टीम बनकर रह गई है। ऐसे उदाहरण बहुतेरे हैं और सारे देश इस में शामिल हैं। क्रिकेट को अगर बचाना है तो क्रिकेट को इस व्यवसायीकरण से आजाद करने की जरूरत है ताकि क्रिकेट की आत्मा जिंदा रह सके।