चुनावी तंत्र के बदलते मायनें

चुने हुए लोग सरकार बन जाते हैं और जो लोग सरकारों को चुनते हैं उनसे सरकारों का कोई खास सरोकार नहीं रह जाता है। 5 साल बाद चुनाव होते हैं और फिर से इस प्रक्रिया को दोहराया जाता है। मुद्दा विहीन होते जा रहे चुनाव में आम आदमी के मुद्दों को कौन सुनेगा?

चुनावी तंत्र के बदलते मायनें

आज भारतीय मतदाता दिवस है। आज ही के दिन 2011 में पहली बार मतदाता दिवस का आयोजन किया गया था। तब तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने चुनाव आयोग के 61 वें स्थापना दिवस को एक नए रूप में शुरू किया। संविधान के अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग के बारे में बताते हैं। 

चुनाव किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है और जब निष्पक्ष चुनाव की बात आती है तो यह सुनिश्चित करना बहुत जरूरी हो जाता है कि लोकतंत्र की आत्मा जिंदा रहे। भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो भारत में जनमत का निर्धारण चुनावों के माध्यम से होता है। ये जनमत संसद और राज्य विधान सभा के लिए होने वाले चुनावों से निर्धारित होते हैं। ये चुनाव निर्वाचन आयोग द्वारा कराए जाते हैं। भारतीय संविधान ने निर्वाचन आयोग को जरूरी अधिकार देते हुए निष्पक्ष तरीके से काम करने के लिए निर्देशित किया है और आयोग ने ये काम बखूबी किया भी है। मैं इस लेख के माध्यम से आपका सामान्य ज्ञान बढ़ाने नहीं आया हूँ बल्कि कुछ सवाल हैं जो आज भी जस के तस हैं और जिनके जवाब हर उस आम नागरिक के पास होने चाहिए जो इस लोकतांत्रिक पर्व में शामिल होता है। 

हाल ही में निर्वाचन आयोग ने देश के 5 राज्यों में चुनाव कराने की घोषणा की है। कोविड-19 महामारी के समय में परंपरागत चुनाव प्रणाली में कुछ विशेष परिवर्तनों के साथ चुनाव कराने की निर्वाचन आयोग की घोषणा अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। जिन 5 राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उनमें से 4 में (उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, गोवा और मणिपुर) भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और एक में (पंजाब में) कॉंग्रेस की। भारतीय राजनीति वर्तमान में एक ऐसे परिवेश में है जहाँ राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व सम्बंधी मुद्दे, आम आदमी के जीवन को प्रभावित करने वाले महँगाई और बेरोजगारी संबंधी मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो चले हैं। मैं यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात कहना चाहता हूँ कि उपरोक्त राज्य सरकारों का आधा कार्यकाल कोरोना महामारी के साये में बीता है ऐसे में उनके उन कार्यों की समीक्षा जरूर होगी जो उन्होंने इस महामारी के दौर में किया है।चूँकि आज राष्ट्रीय मतदाता दिवस है इसलिए इस आलेख का केंद्रबिंदु एक मतदाता ही रहेगा। 

जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उनमें से उत्तराखण्ड को छोड़ दें तो बाकी राज्यों में वहाँ के क्षेत्रीय दलों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। कोरोना काल में भारत के केंद्र और राज्य सरकारों ने बहुत सारे अच्छे और बुरे अनुभवों को सम्भाला है लेकिन यह एक ऐसा दौर है जिसने कई परिवारों के सामने आजीविका का प्रश्न खड़ा कर दिया है। देश में महँगाई अपने चरम पर है और साथ ही बेरोजगारी भी। देश परिवर्तन के एक ऐसे दौर में है जहाँ से आने वाले कल को बहुत बेहतर बनाया जा सकता है लेकिन वर्तमान को बेहतर करना तमाम सरकारों की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए जो कि कहीं से भी नजर नहीं आ रही है। देश की वर्तमान आबादी में एक बड़ी हिस्सेदारी युवाओं की है और युवा पीढ़ी की पहली प्राथमिकता रोजगार है। एक युवा नारों और स्लोगन से अधिक आत्मनिर्भरता चाह रहा है। जिन 5 राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहाँ के चुनाव प्रचार में रोजगार और महँगाई पर चर्चा कम से कम हो रही है। चुनाव प्रचार का मुद्दा मंदिर, हिन्दुत्व और पाकिस्तान तक सिमट गया है। मैंने ये लेख लिखने से पहले बहुत ज्यादा नहीं सोचा था लेकिन जब लिखने बैठा तो लगा कि इन मुद्दों पर बात होनी ही चाहिए। पिछले 5 साल से साल दर साल सरकारी नौकरियों में कमी आती गई है और निजीकरण के तरफ बढ़ती सरकारी महकमों की उदासीनता की रही सही कसर कोरोना महामारी ने पूरी कर दी है। चुनाव वाले इन राज्यों में चुनाव प्रचार एक अलग ही स्तर का है। यहाँ वर्तमान सरकारें अपनी विफलता को छुपाने के लिए छ्द्म राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का लबादा ओढ़ चुकी हैं। महँगाई और बेरोजगारी कोई मुद्दा ही नहीं है। पिछले साल कोरोना महामारी के दूसरे लहर के दौरान देश में जिस कुव्यवस्था का आलम था उसे आज कोई नहीं भूला है लेकिन ये भी कोई मुद्दा नहीं है।आम आदमी से सरकारें समर्थन चाह रही हैं। आम आदमी अपनी तमाम जरूरी मुद्दों को भूल इस छ्द्म राष्ट्रवाद को अपना ले। वो भूल जाए कि उसका कोई कोरोना महामारी में सरकारी तंत्र की विफलता से मरा था। वो भूल जाए कि उसके जरूरतों की पूर्ति महँगाई की वजह से नहीं हो रही है। वो हर बात भूल जाए। सरकारें केवल अपने मनभावन कामों को गिना रही हैं । हर सरकारी तंत्र में सूचनाओं के प्रसार पर नियंत्रण होता है और इसी नियंत्रण में हर सरकार सब कुछ अच्छा होने की बात कह दे रही है।

एक मतदाता अपने तमाम उम्मीदों को सहेज कर एक प्रतिनिध को चुनता है और ऐसे में उस चयनित प्रतिनिधि का कर्त्तव्य बनता है कि वह आम लोगों की बात करे। आम लोगों के बेहतर जीवन के लिए योजनाएं बनाएं और उन्हें लागू करें। चुनाव वाले इन राज्यों में चुनावी नतीजें जो भी हो लेकिन ये तो तय है कि आम आदमी के लिए होने वाले इन चुनावों से आम आदमी के मुद्दे ही गायब हैं।