मछली की कहानी जरूर पढ़ें : बिहार में एक ऐसा जिला जहां से सुखी मछलियों को अन्य जिला साहित कई राज्य में भी भेजा जाता है।

मछलियों के अधिक उत्पादन से शुरू हुआ मछली का सुखड़ा उद्योग। बाढ़ और बारिश के कारण मछलियों के अधिक उत्पादन में लिया नये उद्योग का स्वरूप ।मछली का सुखड़ा उद्योग शुरू होने से डायरिया जैसी संक्रामक बीमारियां हुई कम।

मछली की कहानी जरूर पढ़ें : बिहार में एक ऐसा जिला जहां से सुखी मछलियों को अन्य जिला साहित कई राज्य में भी भेजा जाता है।
सुखी मछली का ढेर।

बाढ़ एवं बारिश के समय अधिक मछली उत्पादन के बाद हर बार डायरिया से मरते थे दर्जनों लोग। बिकने से बची मछलियों को सुखाकर भेजा जाता है बिहार के अन्य जिले सहित बंगाल एवं झारखंड। क्षेत्रीय व्यवसायी सहित दूसरे जिले के व्यवसाई भी हो रहे लाभान्वित ।


समस्तीपुर जिले के मोरवा प्रखंड विगत पांच महीनों से जहां नून नदी की भीषण बाढ़ एवं भारी बारिश से पूरी तरह तबाह होता रहा। तो दूसरी ओर बाढ़ एवं बारिश के कारण मछलियों के अत्यधिक उत्पादन ने मछलियों को सुखा कर बेचने का एक नये उद्योग मछलियों का सुखड़ा उद्योग शुरू हो गया है। अत्यधिक मछलियों के उत्पादन के बाद बिकने से बच चुकी सभी मछलियों को मछली पकड़ने वाले जाल के ऊपर मचान बनाकर धूप में सुखाकर मछलियों के सूख जाने के बाद, सूखी हुई मछलियों को बिहार के विभिन्न जिलों सहित बंगाल एवं झारखंड की मंडियों में निर्यात कर अच्छी-खासी आमदनी की जा रही है। पहले जहां अत्यधिक बार एवं बारिश के कारण क्षेत्र में अत्यधिक मछलियों का उत्पादन होता था, तो बिकने से बची हुई मछलियों को भी अत्यंत सस्ते दर पर मछली व्यवसाई बेच लिया करते थे। अत्यंत सस्ते दर पर कई दिनों की बासी मछलियों को खाकर क्षेत्र के बहुत सारे लोग डायरिया जैसी संक्रामक बीमारी का शिकार हो जाते थे। यही नहीं जानलेवा डायरिया बीमारी से हर बार दर्जनों लोगों की अकाल मौत हो जाती थी। जिसके कारण प्रखंड से जिला एवं राज्य प्रशासन तक में अफरा-तफरी मच जाया करती थी। राज्य सरकार एवं जिला प्रशासन के आदेशानुसार डायरिया वाले इलाकों में शिविर लगाकर महीनों सघन चिकित्सा शुरू कर दी जाती थी। इस बार कई वर्षों के बाद नून नदी की अप्रत्याशित बाढ़ के कारण संपूर्ण मोरवा प्रखंड भीषण रूप से जलजमाव का शिकार हो गया। महीनों की लगातार भारी बारिश ने और भी अफरा-तफरी मचा दी थी। लेकिन बाढ़ और बारिश के कारण भीषण रूप से जल जमाव होने से मछलियों का भरपूर उत्पादन शुरू हो गया। क्षेत्र में बाढ़ और बारिश के कारण जहां हरी सब्जियों के भाव में आग लग गई , वहीं 15 से 20 रुपए किलो में बहुत अच्छी मछलियां बिकने लगी। मछलियों के भरपूर उत्पादन के कारण बाहर निर्यात नहीं हो पाने एवं बिकने से बस जाने के बावजूद बहुत मात्रा में बची हुई मछलियों को सुखाकर सुखी हुई मछलियों को बाहर की मंडियों में बेचने के इस नए उद्योग से क्षेत्र के व्यवसाई सहित दूसरे अन्य जिलों के व्यवसायियों ने भी नून नदी के किनारे आकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया है। क्षेत्र के मछली उत्पादकों के द्वारा प्रतिदिन बिकने वाली मछलियों के भारी मात्रा में बस जाने के बाद मछली के सुकरा व्यवसायियों के द्वारा 4 से पांच रुपए किलो में उसे खरीद लिया जाता है। और इन सस्ते दर पर खरीदी गई कच्ची मछलियों को धूप में सुखाने के बाद उसे बाहर की मंडियों में पचास से सौ रुपए प्रति किलो बेचकर अच्छी-खासी आमदनी की जा रही है। जंदाहा के मछली के सुखड़ा व्यवसायी रामेश्वर साह एवं रंजीत सहनी तथा मोरवा के रामेश्वर साहनी,राम लखन साहनी सहित अन्य व्यवसायियों के अनुसार सूखी हुई मछलियों की मांग बिहार के पूर्णिया, किशनगंज, दार्जिलिंग एवं आसनसोल सहित बंगाल के अन्य क्षेत्रों तथा झारखंड के विभिन्न जिलों में भारी मांग बनी हुई रहती है। पश्चिम बंगाल एवं बांग्लादेश में लोग दाल में भी सूखी हुई मछलियों को खाना पसंद करते हैं इसीलिए उन क्षेत्रों में सब दिन सूखी हुई मछलियों की मांग बनी हुई रहती है। मछली के इन सुखड़ा व्यवसायियों के अनुसार कच्ची मछलियों को सुखाने के बाद उसका वजन तिगुना कम हो जाता है इसके बावजूद भी लागत से कहीं अधिक मुनाफा प्राप्त हो जाता है। पश्चिम बंगाल एवं बांग्लादेश में लोग दाल में भी सूखी हुई मछलियों को खाना पसंद करते हैं , इसीलिए उन क्षेत्रों में इन सूखी हुई मछलियों की मांग सब दिन बनी हुई रहती है।