आपदा का रूप ले चुकी है भारत में बेरोजगारी

आज 'सोने की चिड़िया' कहलाने वाला देश बेरोजगारी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। इस बार छात्र और सरकार आमने-सामने नज़र आ रहे है। आज देश में बेरोजगारी भयावह समस्या बनते जा रही है। वर्तमान सरकार आये दिन सभी सरकारी नौकरियों में पदों की संख्या कम करती जा रही है। अगर कोई बहाली भी आती है तो उसकी परीक्षा होने और अंतिम रूप से चयन की प्रक्रिया में 3-4 वर्षों से अधिक लग जा रहे हैं। पूर्व से निकाले गए नोटिफिकेशन में एन टी पी सी ने अपने नियम बीच मे ही बदल दिये हैं। इसके पहले जारी परिणाम के नियमों में भी अनुदेशों से हट के नियम बदले गए, जिसके बाद जगह जगह छात्रों का व्यापक विरोध देखने को मिला है। पटना के राजेन्द्र नगर टर्मिनल को छात्रों ने 9 घण्टों तक व्यवधान में रखा। जिसके बाद पुलिस और छात्रों के बीच हिंसा तक देखने को मिली।देखते- देखते आंदोलन की लपटें देश के की शहरों तक पहुँच गई। छात्रों के व्यापक रोष को देखते हुए सरकार ने एक समिति बनाई है, जिसके द्वारा समाधान करने का प्रयास होगा।

आपदा का रूप ले चुकी है भारत में बेरोजगारी

आज 'सोने की चिड़िया' कहलाने वाला देश बेरोजगारी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। इस बार छात्र और सरकार आमने-सामने नज़र आ रहे है। आज देश में बेरोजगारी भयावह समस्या बनते जा रही है। वर्तमान सरकार आये दिन सभी सरकारी नौकरियों में पदों की संख्या कम करती जा रही है।  अगर कोई बहाली भी आती है तो उसकी परीक्षा होने और अंतिम रूप से चयन की प्रक्रिया में 3-4 वर्षों से अधिक लग जा रहे हैं। पूर्व से निकाले गए नोटिफिकेशन में एन टी पी सी ने अपने नियम बीच मे ही बदल दिये हैं। इसके पहले जारी परिणाम के नियमों में भी अनुदेशों से हट के नियम बदले गए, जिसके बाद जगह जगह छात्रों का व्यापक विरोध देखने को मिला है। पटना के राजेन्द्र नगर टर्मिनल को छात्रों ने 9 घण्टों तक व्यवधान में रखा। जिसके बाद पुलिस और छात्रों के बीच हिंसा तक देखने को मिली।देखते- देखते आंदोलन की लपटें देश के की शहरों तक पहुँच गई। छात्रों के व्यापक रोष को देखते हुए सरकार ने एक समिति बनाई है, जिसके द्वारा समाधान करने का प्रयास होगा।

 

बेरोजगारी की स्थिति पूरे देश मे भयावह है, जिसका रोष छात्रों में देखने को मिल रहा है।सीएमआइइ (सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकानामी) की 31 दिसंबर तक के आंकड़ों के आधार पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक  बेरोजगारी का राष्ट्रीय दर नवंबर में 7.1 % था, जो बढ़ कर दिसंबर में 7.91 हो गया है। बेरोजगारी के राष्ट्रीय दर में 0.90 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। जहां तक शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की बेरोजगारी का सवाल है, दिसंबर में दोनों क्षेत्रों में वृद्धि दर्ज की गई है। पूरे साल की तुलना करें तो बिहार में दिसंबर में सर्वाधिक बेरोजगारी दर दर्ज की गई है। बिहार में एक प्रतिशत से अधिक बेरोजगारी बढ़ी है। नवंबर में राज्य में बेरोजगारी दर 14. 8 प्रतिशत थी। दिसम्बर में यह 16 प्रतिशत हो गई।

 

 देश के छह राज्यों में बेरोजगारी दर इस समय दो अंकों में है। बिहार का चौथा स्थान है। बेरोजगारी के मामले में हरियाणा शीर्ष पर है। दिसंबर में इस राज्य में बेरोजगारी 34.1 प्रतिशत पर पहुंच गई। 27.1 प्रतिशत बेरोजगारी दर के साथ राजस्थान दूसरे नम्बर पर है। 17.3 प्रतिशत बेरोजगारी दर के साथ झारखंड तीसरे नंबर पर पहुंच गया है। हरियाणा, राजस्थान, झारखंड और बिहार के अलावा त्रिपुरा और जम्मू-कश्मीर की बेरोजगारी दर दो अंकों में है। ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में बेरोजगारों की फौज इकट्ठा हो रही है। भारत में जो हालात हैं, उसमें बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है।

बेरोजगारी भारत के लिए सिर दर्द बन गया है और इसके कारण करोड़ो युवाओं को घर बैठने पर मजबूर होना पड़ा है। देश में बेरोजगारी की समस्या कोई नई नहीं है। गरीबी हटाओ का अभियान आज से लगभग 45 वर्ष पहले इंदिरा गांधी ने प्रारंभ किया था। लेकिन आज 21 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में बेरोजगारी अपनी जड़ बहुत मजबूत कर चुकी है। जिस तरह उसके उन्मूलन के लिए प्रयास किया जा रहा है उससे लगता है कि यह उन्मूलन इतना आसान नहीं है। एक युवक के बेरोजगार रहने से न सिर्फ उस युवके के रहन सहन पर असर पड़ता है बल्कि उनपर आश्रित पूरे परिवार को निम्न स्तर की जिंदगी भी नसीब नहीं हो पाती है।

 

 देश में शिक्षा की कमी, रोजगार के अवसरों की कमी, कौशल की कमी, प्रदर्शन संबंधी मुद्दे और बढ़ती आबादी सहित कई कारक भारत में इस समस्या को बढ़ाने में अपना योगदान देते हैं। इस कारण से भारत के जीडीपी पर भी असर साफ़ दिख रहा है । बेरोजगारी की वजह से गंभीर सामाजिक- आर्थिक परिणाम होते हैं। इससे न केवल एक व्यक्ति बल्कि पूरा समाज प्रभावित होता है। बेरोजगारी समाज में विभिन्न समस्याओं का मूल कारण है। बेरोजगारी को दूर करने के लिए हालांकि सरकार ने कुछ हद तक कदम भी उठाए हैं लेकिन उठाये गये उपाय पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं। सरकार योजनाओं के माध्यम से निजी नौकरियों में वृद्धि करना चाहती है लेकिन कोरोना के बाद निजी क्षेत्र खुद ही घुटन महसूस कर रहा है। उच्च डिग्री प्राप्त किए हुए छात्र सरकारी नौकरी के इंतज़ार में हैं लेकिन सरकार नोटिफिकेशन निकालने के लिए तैयार नहीं है। अगर नोटिफिकेशन निकल भी गया तो परीक्षा समय पर नहीं हो पाती है। इसका उदाहरण हमारे सामने है- एन टी पी सी द्वारा 2019 में निकाले गए नोटिफिकेशन के बाद भी अब तक पूर्ण नहीं हो पाया है। हद तो ये है कि बिहार में बी एस एस सी द्वारा 2014 में निकाले गए नोटिफिकेशन की भर्ती अब तक पूर्ण नहीं हो पाई है।

 

एन टी पी सी की वैकेंसी पर प्रतियोगी छात्र प्रिंस ने बतलाया कि  2019 में आई इस नोटिफिकेशन में कहा गया था कि पहले फेज के परीक्षा में 20 गुना अधिक रिजल्ट घोषित होगा लेकिन जब रिउल्ट आया तो 1 ही अभ्यर्थी का 5-5 पदों के लिए हो गया और किसी का 75 मार्क्स लाकर भी सीबीटी 2 देने के लिए चयन नहीं हुआ। देश के हजारों छात्र इस निर्णय से बहुत गुस्से में है। वर्तमान मोदी सरकार और रेलवे बोर्ड को फिर से रिजल्ट देना होगा नहीं तो देश के युवा बहुत बड़ी क्रांति लाने वाले हैं।

एक प्रतियोगी छात्र आदर्श ने कहा कि रेलवे ग्रुप डी की जो 2019 में ही बहाली आयी था। अब 3 वर्ष बाद बोर्ड का निर्णय आया है कि इसमें भी दूसरे फेज की परीक्षा होगी। 3 वर्षो में परीक्षा नहीं हुई और अब इस निर्णय से लग रहा है विलम्ब होते जाएगा । रोहित कहते हैं कि ऐसा लग रहा है कि सरकार युवाओं को रोजगार देना ही नहीं चाहती है । बस युवाओं को बरगलाया जा रहा है। ये देश के युवाओं के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है। अगर अभी से सरकार ने व्यवस्था को नहीं सुधारा  तो छात्र एक बड़े आंदोलन पर जा सकते है क्योंकि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।

 

शिक्षा और बेरोजगारी का भी गहरा संबंध है। आज भी भारत की जनसंख्या का एक बड़ा अनुपात अशिक्षित है, तो आशिक्षा के चलते बेरोजगारी का आना तो स्वभाविक बात है। क्योंकि भारत में स्किल का भाव है। परंतु आज कल अशिक्षा के साथ साथ शिक्षित बेरोजगारी भी बहुत बड़ी समस्या है। हर छात्र के द्वारा एक ही तरह की शिक्षा को चुना जाना। जैसे आज कल हम कई सारे इंजीनीयर्स को बेरोजगार भटकते देखते है, इसका कारण इनकी संख्या की अधिकता है।

 

 आज कल हर छात्र दूसरे को फॉलो करना चाहता है, उसकी अपनी स्वयं की कोई सोच नहीं बची। वो बस दूसरों को देखकर अपने क्षेत्र का चयन करने लगा है। जिसके परिणाम यह सामने आए है कि उस क्षेत्र मे रोजगार की कमी और उस क्षेत्र के छात्र बेरोजगार रहने लगे। आज कल यह आम बात है कि छोटी छोटी नौकरी के लिए भी अच्छे पढे लिखे लोग आवेदन करते है, इसका कारण बेरोजगारी के चलते उनकी मजबूरी है।

सरकार को बेरोजगारी के समाधान करने के लिए दूरगामी उपाय करनी होगी। इसके लिए सरकार को चाहिए कि सरकारी नोटिफिकेशन में अनियमितता को खत्म करे और संबंधित बोर्ड एक कैलेंडर जारी कर के समय पर परीक्षा आयोजित करे। इसके लावा परीक्षाओं में हो रही धांधली को भी रोकना होगा। इसके लिए पारदर्शिता अपनाया जरूरी है। छात्रों को भी समझना चाहिए कि सिर्फ सरकारी नौकरी को ही रोजगार न माने और निजी नौकरी और स्वरोजगार को भी अपनाएं।

 

 इसके अलावा जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाने पर ध्यानाकर्षण करना होगा । तात्कालिक उपाय के रूप में लोगों को निजी व्यवसायो में लगने के प्रशिक्षण की व्यवस्था करके उन्हें धन उपलब्ध कराना होगा। ताकि नौकरियों की तलाश कम हो सके और लोग स्वरोजगार अपना कर भरण पोषण कर सकें। बैंक से ऋण लेने में लोगों को विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसका समाधान त्वरित जरूरी है।

 

गांवो में बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए कुटीर उद्योग-धंधों को बढ़ावा देना होगा । इसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षण सुविधाओ की व्यवस्था की जानी चाहिए तथा समय पर कच्चा माल उपलब्ध कराना होगा। सरकार को उचित मूल्य पर तैयार माल खरीदने की गांरटी देनी होगी। यह काम सहकारी सस्थाओं के द्वारा आसानी से कराया जा सकता है । बेरोजगारी दूर करने के दीर्घगामी उपाय के रूप में हमे अपनी शिक्षा-व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना पड़ेगा । नई शिक्षा नीति में होने वाले परिवर्तन से कुछ समाधान हो सकता है लेकिन उसका प्रभाव दूरगामी ही होगा त्वरित नहीं।

 

सरकार को चाहिए कि ठोस कदम उठाए और छात्रों के रोष को कम किया जाए। इसके किए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इसके अलावा नीति निर्माताओं और नागरिकों को अधिक नौकरियों के निर्माण के साथ ही रोजगार के लिए सही कौशल प्राप्त करने के लिए सामूहिक प्रयास करने चाहिए।

 

-- नृपेन्द्र अभिषेक नृप