सामाजिक समस्याओं पर चोट करता 'जारी है लड़ाई'

सामाजिक समस्याओं पर चोट करता 'जारी है लड़ाई'


"किया मुक को मुखर, लिया कुछ दिया अधिकतर,
पिया गरल पर किया , जाति साहित्य को अमर।"



'जारी है लड़ाई' को मिला डॉ व्रज लाल वर्मा सम्मान 2020

कविता कामिनी के कमनीय कांत कलेवर को कोमल काव्य कुसुम से अलंकृत करने वाले कवि कलाधर संतोष पटेल ने अपनी कविता संग्रह " जारी है लड़ाई" के माध्यम से समाज के पिछड़े तबके के समस्याओं पर अपने कविताओं के माध्यम से बड़ा ही मनोहरी वर्णन किया है। स्त्री , दलित , आदिवासी , अल्पसंख्यक यानी बहुजन समाज की जिंदगी के कई गुमनाम पहलुओं को केंद्र में रखे है। आज तक जिन लोगो को गुमनामी में जीना पड़ा है उन सब पर बड़ा ही मार्मिक पंक्तियों के माध्यम से समाज को आइना दिखाने का कार्य किया गया है। इसके अलावा गौण रूप में जो प्रवृत्ति देखी जा सकती है उनमें पारिवारिक और सामाजिक मूल्य, माता-पिता, बेटी, न्याय व्यवस्था, तथाकथित राष्ट्रवाद, और व्यक्तिगत जीवन पर भी कलम तोड़ लेखन किए है।


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समाजवादी विचारों की दुल्हन को भावों की कविता की डोली में बिठाकर शब्दों के कंधे पर ढोनेवाले विचार - विभा के कमनीय कंहार संतोष पटेल का यह काव्य संग्रह "जारी है लड़ाई" अपने भाव और शिल्प से ज्यादा अर्थ के आयाम और विषयों की विविधता के कारण साहित्य की दुनियां में चर्चित रहा है। संतोष पटेल शताब्दियों से वंचित और प्रताड़ित दलितों की सच्चाई को शब्दबद्ध करते रहे हैं। अपनी कविता 'खाली करो जंगल' में आदिवासियों के दुःख दर्द और मनः स्थिति को बड़ा ही मार्मिक शब्दों में वर्णन किया है। कवि ने आदिवासियों के नाम पर सरकारी फंड को लूटने वाले एनजीओ पर कहर बरपाते हुए कहते हैं- "तुम्हारे घरों में बनकर गुलाम, तुम्हारे एनजीओ की का धंधा चमकाने, जिनकी तस्वीर अपनी एनुअल रिपोर्ट में छाप कर, पाते हो दुनिया में आवर्ड।" 

अपने पूरे जीवन मे संघर्षरत दशरथ मांझी पर लिखी कविता "माउंटेन मैन दशरथ मांझी" में तो उन्होंने कलम ही तोड़ कर रख दिया है। एक व्यक्ति जब कुछ कर गुजरने की कसम खा ले तो कुछ भी कर सकता है। लेकिन उनके संघर्ष की बाद भी सामाजिक हीनता को सहना ही पड़ा है। पहाड़ को महज़ छेनी-हथौड़ी से काट कर लोगों के लिए रास्ता बनाने जैसे कार्य को अकेले, सिर्फ अपनी इच्छा शक्ति और जुनून से पूरा करने पर भी किसी व्यक्ति को केवल उसकी जाति के कारण वह पहचान, वह सम्मान नहीं मिल पाया। मांझी दीन हीन लाचार तो है लेकिन विचारों से महान है जिसके हृदय में तूफान है। उनकी मनः स्थिति यह कहती है- "तन का बहा पसीना तो करना घर मे आँसू की खेती , खाने की दिन आए तो करना घर मे आँसू की खेती।" तपती धूप में आज भी अपने सम्मान का इन्तेजार करते दिख रहे है। 


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शीर्षक कविता " जारी है आजादी की असली लड़ाई" में सामाजिक रूप से पिछड़े जन को उनके समक्ष खड़े समस्याओं के समाधान को उनकी आजादी की लड़ाई से जोड़ कर देखते है। संविधानिक अधिकार के बाद देश के राजनैतिक हस्तियों ने भी कुछ विशेष नही किया अबतक और न ही मानसिक रूप से आजादी दिला पाए। कहते है-- " करते हुए प्रेम दशरथ मांझी की तरह, सबके साथ समता और न्याय से , क्योंकि जारी है आजादी की असली लड़ाई।" एक अन्य कविता “मुझे जो घंटियाँ पसंद हैं” जीविका के लिए श्रम करने वालों और जीविका के लिए आडंबर करने वालों के बीच के बारीक अंतर का एहसास दिलाती हैं। जहाँ यह कविता विभिन्न कर्म प्रधान ध्वनियों का मूल्य समझाती हैं वहीं संग्रह की एक कविता “खाली करो जंगल” में एक आदिवासी के जीवन का महत्व धरती के औद्योगिक, आधुनिक और तथाकथित विकसित व सभ्य वर्गों के लिए क्या है, यह दिखलाती है। यह कविता जंगल में रहने वालों के हक को रखते हुए बतलाती है कि किस तरह आदिवासियों को कितनी ही बार उनकी वन रूपी पूंजी या कहें संपत्ति से अलग करके उनके जीवन को छिन्न-भिन्न कर के मानसिक रेगिस्तान के बीच में छोड़ दिया जाता है । जहाँ वह बिना दिशा के बढ़ने पे मजबूर होते हैं एक अजनबी दुनिया में, जो उनको नोचने और उनके अपनों का शोषण करने के लिए तैयार खड़ी है।


पर्यावरण संरक्षण के लिए लॉकडाउन  उपयोगी

किसान या हाशिये के गरीब जनमानस की दुर्दशा "खेल" जैसी रचना में सहज ही देखी जा सकती है। कैसे सत्ता इन्हें हमेशा से ही नज़रंदाज़ करती आई है। क्यों इनके लिए किसी ने कभी कुछ ऐसा नहीं किया जिससे ये अपनी त्रासदी से उबर सकें। लोगों के स्वाभिमान के गिरते स्तर को बिना पेंदी का लोटा में बखूबी दर्शाया गया है। दिखाया गया है कि कैसे इंसान अपने स्वार्थ और मतलब के लिए अपनी सोच या विचारधारा से तुरंत समझौता कर लेता है। यद्यपि उसके पास उसकी कोई अपनी विचारधारा भी नहीं होती फिर भी। वहीं बिखरते पारिवारिक मूल्यों पर चोट करती रचना है "टूटती साँसे"।


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जारी है लड़ाई में शोषितों के अलावा अलग मिजाज की भी कविताएं हैं। 'फिर तुम ही जनों' में मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों के मंदिर प्रवेश के रोकपर मठाधीशों से सवाल कर स्त्री का समर्थन करते हैं। 'गायब है' में कवि सरकारी पाखंड को बखूबी व्यक्त करता है-"गायब है बेरोजगारी का डाटा, सरकारी वेबसाइट से , नेता जी के बाइट से।" 'लाचार' कविता आम आदमी के दुख दर्द को उजागर करती है तो 'प्रेम करना इतना आसान नहीं है' में प्रेम की वास्तविकता का उल्लेख किया गया है। प्रेम को समझने में होने वाली कठिनाइयों की बात करते हुए कहते है कि प्रेम को समझना आसान नही है । अगर सभी आसानी से समझ जाते तो इंसान एक दूसरे से प्यार करते उससे घृणा नही करता और न ही उसे अपना गुलाम और दास बनाया होता। संग्रह की अंतिम कविता 'जीत अंततोगत्वा हमारी होगी' में कवि आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं कि आखिर उनकी जीत होगी। वे हर इकाई से लड़ने के लिए तैयार हैं जिन्होंने इन्हें दबा रखा है सालों से। जीवन मे जीत का महत्व होता है और वे सामाजिक जीत की बात करते है , जिसके बाद जिंदगी को पा लेने में व्यक्ति सक्षम हो जाता है।

"पलायन" में गरीबों की दशा और मनःस्थिति और उनकी बेबसी और लाचारी को दर्शाया गया है। एक व्यक्ति कैसे पहले गरीब, फिर मजदूर और फिर परदेसी हो जाता है इसका अच्छा चित्रण पलायन में देखा जा सकता है। पेट एक ऐसी चीज़ है जिसके आगे सभी झुक जाते हैं। जिसके आगे किसी का बस नहीं चलता। पेट जो न कराये, इंसान को करना ही पड़ता है। वहीं चिड़िया जैसी कविता देश के भीतर पनप रहे वहशियाना माहौल की द्योतक है। मनुष्य की मानवीय सीमाओं को लांघने की कहानी आपको 'अग्नि' कविता में मिल जाती है कि कैसे मनुष्य पेट के लिए या फिर अपने परिवार जनों की भूख शांत करने के लिए, उनका पेट पालने के लिए किसी भी हद तक चला जाता है। इसमें फिर कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं होता। सब ज़रूरत के मद्देनजर होता है। यहाँ विवेक, और जीवन के बड़े-बड़े मूल्य धरे के धरे रह जाते हैं। अगर कोई चीज़ सही लगती है तो बस रोटी।

इस संग्रह में कोई भी कविता दूसरे से कम या अधिक प्रभावशाली नहीं है, उसी तरह जिस तरह लाल रंग नीले से अलग है, नीला पीले से और पीला लाल से। हाँ, इन अलग रंगों को आप अलग-अलग तरह मिला कर देखेंगे तो निश्चित ही नए रंग भी उभर के आएंगे। सभी रचनाओं में कवि की प्रगतिशील सोच देखा जा सकता है।प्रगतिशील समाज की उम्मीद को जैसी चुनौती मिलती दिखाई देती है इसी से उत्पन्न खीझ को रचनाकार ने अपना हथियार बनाया है और उसे एक मजबूत और सकारात्मक ढाल के रूप में इसे अपना अंग बना लिया है। कवि ने खुद की भूमिका एक जन कवि के रूप में रखने की कोशिश की है और वे इसमें सफल भी रहे हैं। 


--- नृपेन्द्र अभिषेक नृप