'जारी है लड़ाई' को मिला डॉ व्रज लाल वर्मा सम्मान 2020

'जारी है लड़ाई' को मिला डॉ व्रज लाल वर्मा सम्मान 2020

नई दिल्ली।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी और वर्तमान युग मे युवाओं के दिलो पर राज करने  वाले  युवा कवि संतोष पटेल की बहुचर्चित काव्य कृति 'जारी है लड़ाई' को वर्ष 2020 'डॉ व्रजलाल वर्मा सम्मान' प्रदान किया गया है। डॉ व्रजलाल वर्मा फाउंडेशन- पीपुल फॉर सोसाइटी,कानपुर, उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में डॉ ए.के. अग्निहोत्री प्रोफेसर- यूनिवर्सिटी लंदन ऑफ विंडसर की अध्यक्षता में गठित चयन समिति ने इस काव्य संकलन को इस प्रतिष्ठित सम्मान हेतु चयनित किया है। संतोष पटेल गांव से लेकर महानगरों तक साहित्य रचना करते हुए अपने समय का सच लिखा है। उस सच को जिसे कथित मुख्यधारा के साहित्य में कहीं दूर नेपथ्य में ढकेल रखा है। पुस्तकों के जरिए समाज के सच का उद्घाटन किया गया है।


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यह किताब 59 कविताओं का  संकलन और उसमें शामिल कविताएँ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के इस पक्ष को बड़ी शिद्दत से उकेरती हैं।संकलन का शीर्षक ही उसके मसौदे को सटीक रूप से इंगित करता है। संतोष पटेल की कविताएं हाशिये के समाज के- आम आदमी के जीवन मरण से संबंद्ध रखते उपविषयों पर ,जिन पर उनकी राजसत्ता से लड़ाई चल रही है, ही केंद्रित हैं।

अगर इस संग्रह की मूल आत्मा की बात की जाए तो अपनी तमाम विविधता के बावजूद इन कविताओ में एक अंतर्धारा अनुस्यूत है । वह है प्रतिरोध और उसके जीत के प्रति आस्था। संतोष अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध के कवि है लेकिन ये छद्म प्रतिरोध के कवि नही। प्रतिरोध भी दो तरह का है एक जिसको उत्पीड़क पसन्द करता है। यह प्रतिरोध उत्पीड़क को अंततः मजबूत ही करता है। ऐसे प्रतिरोध को लिखने वाले कवि उत्पीड़क द्वारा ही पुरस्कृत होते हैं। जैसे निर्मला पुतुल  आलोक धन्वा और अनिल यादव। ऐसे ही प्रतिरोध के बारे में किसी कवि ने लिखा – खूब लड़े उस्ताद दुश्मन से हुए पुरस्कृत।


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एक प्रतिरोध वह भी है जो उत्पीड़क को तिलमिला देता है। ऐसे प्रतिरोध की कविता लिखने वाले कवि की जगह जेल या सजा होती है। फूको ने अपने इंटरव्यू जो पावर/नॉलेज किताब में संग्रहित है , में कंगारू कोर्ट पर बोलते हुए  बताया है कि यह प्रतिरोध स्वतः स्फूर्त होता है। इस प्रतिरोध में संरचना नही होती। यह प्रतिरोध  अचानक होता है।

एक ज़माने में प्रिंट मीडिया बड़ी अहमियत रखता था। फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आया और पटेल कहते हैं कि जब मुख्य धारा "भांड मीडिया" हो गई ऐसे समय मे सोशल मीडिया मुख्य धारा को आइना दिखाने लगी  और राजा लोगों ने सोशल मीडिया के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए अपनी भारीभरकम फौज उतार दी। देश का 80 प्रतिशत से अधिक वर्ग जठराग्नि से ग्रसित है और पटेल इंगित करते हैं कि शासकों के लिए इनके माध्यमो से विभिन्न कार्यों में सदुपयोग के रेट तय हैं। शासकों के चमचे त्रिलोक ज्ञानी बने राष्ट्रवाद और संस्कृति का पाठ पढ़ा रहे हैं। ऐसे परिदृष्य में निर्भया जैसी दुर्दांत घटना पर सभ्रांत समाज ने संवेदना बेंची। पटेल बिहार से गिरमिटिया मज़दूर जो अफ्रीका और उत्तरी दक्षिण अफ्रीकी देशों में जबरिया बसाए गए और कालांतर में उन्होंने स्थानीय अफ्रीकी /दक्षिण अमेरिकी संस्कृति अपनाई। अब देशी राजा लोग इन्हें हिन्दू बनाने में जी जान से जुटे हुए हैं!


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उन्होंने कविता में बताया है कि उपनिवेश तो कभी जाति के नाम पर एक इन्सान को दूसरा इन्सान गुलाम बनाता है सताता है अगर प्रेम करना आसान होता तो यह नही होता-
‘‘प्रेम यदि होता तो नही होता
रंगभेद नस्ल भेद जाति भेद
लिंग भेद वर्ग भेद धर्म भेद ”

संतोष पटेल के इस उपलब्धि पर साहित्यकारों ने खुशी जाहिर की है। इस घोषणा के बाद संतोष पटेल ने कहा कि  इस सम्मान मिलने से वे खुशी से गदगद  है और वे दुगुने उत्साह से सामाजिक विषयों पर अपनी कलम काव्य के माध्यम से चलाते रहेंगे।


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