नेहरू वर्तमान में कितने प्रासंगिक: नृपेंद्र अभिषेक नृप

नेहरू वर्तमान में कितने प्रासंगिक: नृपेंद्र अभिषेक नृप

"एक ऐसा क्षण जो इतिहास में बहुत ही कम आता है, जब हम पुराने के छोड़ नए की तरफ जाते हैं , जब एक युग का अंत होता है, और जब वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा, अपनी बात कह सकती है।" जवाहर लाल नेहरू का यह कथन उनके विचारों को रेखांकित करता है। नेहरू बहुमुखी प्रतिभा के धनी एवं दृढ़ संकल्प के व्यक्ति हैं थे। लोगों के लिये उनके स्नेह एवं बच्चों के लिये उनके प्यार ने उन्हें बहुत लोकप्रिय बना दिया। जवाहरलाल नेहरु भारत के पहले प्रधानमंत्री थे और स्वतंत्रता संग्राम के समय से भारतीय राजनीति के प्रमुख नेता थे ।उन्होंने महात्मा गाँधी के साथ भारत को स्वतंत्र बनाने के लिए एक साथ संघर्ष किया और देश की आजादी के बाद भी सन 1964 अपनी मृत्यु तक देश की सेवा करते रहे।जवाहरलाल नेहरु को आधुनिक भारत का रचयिता कहा जाता था। पंडित जवाहरलाल नेहरू एक महान व्यक्ति, नेता, राजनीतिज्ञ, लेखक और वक्ता थे। वह बच्चों से बहुत प्यार करते थे और गरीब लोगों के बहुत अच्छे दोस्त थे। उन्होंने हमेशा खुद को भारत के लोगों का सच्चा सेवक समझा। उन्होंने इस देश को एक सफल देश बनाने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत की। 


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वह दूरदृष्टि वाले व्यक्ति थे। वह एक नेता, राजनीतिज्ञ और लेखक थे। उन्होंने भारत को एक देश बनाने के लिए राष्ट्र की बेहतरी के लिए काम किया। जवाहरलाल नेहरू दूरदर्शी व्यक्ति थे। उन्होंने आदर्श वाक्य 'आराम हराम है' दिया। जवाहरलाल नेहरू शांति के व्यक्ति थे लेकिन उन्होंने देखा कि भारतीयों का इलाज अंग्रेजों द्वारा किया जाता था। जिसके कारण उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होना चुना। उन्हें अपने देश के लिए एक जुनून था जिसके कारण उन्होंने महात्मा गांधी (बापू) से हाथ मिलाया। इस वजह से, वह महात्मा गांधी के असहयोग प्रस्ताव में शामिल हो गए। अपने स्वतंत्रता संग्राम में, उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वह बच्चों के बहुत शौकीन थे इसलिए उनके विकास और उन्नति के लिए कई रास्ते बनाए। बाद में भारत सरकार द्वारा प्रत्येक वर्ष बच्चों के जन्मदिन पर उनकी जयंती के दिन बाल दिवस मनाया जाता है। वर्तमान में, बाल स्वच्छ भारत नाम का एक और कार्यक्रम भारत सरकार द्वारा उनकी जयंती पर मनाया जाने लगा है।

नेहरू पूंजीवाद के सख्त विरोधी और समाजवाद के पक्षधर थे। वे कहते थे - "यदि पूंजीवादी शक्तियों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो वे अमीर को और अमीर और गरीब को और गरीब बना देंगी।" जबकि समाजवाद के बारे में उनका कहना था -- "समाजवाद न केवल जीने का तरीका है, बल्कि सामजिक और आर्थिक समस्यों के निवारण के लिए एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।" नेहरू के समाजवाद पर पाश्चात्य तत्त्वों का गहरा प्रभाव था। नेहरू व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बड़े समर्थक रहे हैं। वे समाजवाद एवं पाश्चात्य उदारवादी चिंतन के बीच सामंजस्य स्थापित कर चलना चाहते थे। वे संसदीय संस्थाओं के माध्यम से समाजवादी रूपांतरण लाना चाहते थे। नेहरू का समाजवाद पूरी तरह मार्क्सवाद से प्रभावित नहीं था। नेहरू ने ’राष्ट्रवाद’ का वैसा विरोध नहीं किया जैसा कि मार्क्स ने किया था। नेहरू ’सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के समर्थक तो नहीं हैं किन्तु राष्ट्र को एक व्यावहारिक इकाई के रूप में स्वीकार करते है। नेहरू ने वर्ग संघर्ष तथा ’हिंसक क्रांति’ के विचार को स्वीकर नहीं किया। इसके स्थान पर उन्होंने गांधी से प्रभावित होकर अहिंसा और वर्ग सहयोग की धारणाओं को स्वीकार किया। नेहरू ने ऐतिहासिक भौतिकवाद में निहित दृष्टिकोण का समर्थन किया, किन्तु स्पष्ट रूप से कहा कि भविष्य के प्रति निर्धारणवादी व्याख्या स्वीकार नहीं की जा सकती।


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नेहरू अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती वर्षों से ही संप्रदायवाद के विरोधी थे। नेहरू की राजनीतिक यात्राओं तथा विभिन्न युवा सम्मेलनों में उनके द्वारा दिये गए भाषणों में सांप्रदायिकता को मुख्य निशाना बनाया गया। नेहरू तथा अन्य राष्ट्रवादियों द्वारा स्थापित ‘स्वतंत्र भारत लीग’ में किसी भी संप्रदायवादी या सांप्रदायिक संगठन से जुड़े व्यक्ति को सदस्यता प्रदान करने का निषेध किया गया था। नेहरू ने धर्म को मात्र एक सांस्कृतिक प्रेरणा तथा विरासत के रूप में स्वीकार किया। वे महात्मा गांधी की तरह धर्म की नैतिक अनिवार्यता को व्यावहारिक आवश्यकता के रूप में स्वीकार करते थे।

नेहरू का धर्मनिरपेक्ष पर अलग मत था। उनके अनुसार धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ यह नहीं है कि लोग अपने-अपने धर्मों का त्याग कर दें, बल्कि इसका अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों की सुरक्षा करे किंतु दूसरों की कीमत पर किसी धर्म का पक्षपोषण न करे और न ही किसी धर्म को राज्यधर्म के रूप में स्वीकार करे। नेहरू के दृष्टिकोण में लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता आपस में घनिष्ठता से जुड़े हैं तथा संयुक्त रूप से ये एक ऐसे भारत का निर्माण करने में सक्षम हैं जो मानव की महत्ता तथा उसके व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास को प्रोत्साहित करे एवं जिसमें दलितों एवं गरीबों के जीवन स्तर में भी स्तरीय सुधार आए। उनका पारंपरिक धर्मों के प्रति वही नज़रिया था जो मार्क्स का था। उन्होंने ’मेरी कहानी’ में लिखा है -- "पारंपरिक धर्मो ने मानव को नुकसान ज्यादा तथा लाभ कम पहुँचाया हैं।"


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नेहरू ने हमेशा अछूतों के सुधार, समाज के कमजोर वर्गों के लोगों, महिलाओं और बाल कल्याण के अधिकार को प्राथमिकता दी। भारतीय लोगों के कल्याण के लिए सही दिशा में महान कदम उठाने के लिए पूरे देश में “पंचायती राज” प्रणाली शुरू की गई थी। उन्होंने भारत के साथ अंतर्राष्ट्रीय शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए “पंच शील” प्रणाली का प्रचार किया और भारत को दुनिया के अग्रणी देशों में से एक बनाया। लेकिन उनका पंचशील सिद्धान्त तब असफल हो गया जब चीन भाई चारा का नारा दे कर युद्ध की घोषणा कर दिया था। वह एक ऐसा समय था जिस समय भारत खुद को तैयार नही कर पाया था। भारत ने आजादी की लड़ाई में इतने खून खराबा देख लिया था कि भारत शांति की ओर जाना चाहता था। नेहरू ने एक बार कहा था - "शांति के बिना सभी सपने खो जाते है और राख में मिल जाते है।" नेहरू के चीन के साथ नीति को ले कर अब भी उनकी आलोचना होती रही है और यह सवाल नेहरू का पीछा कभी भी छोड़ता नही दिख रहा है। नेहरू पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंधों में सुधार नहीं कर पाए। उन्होंने चीन की तरफ मित्रता का हाथ भी बढ़ाया, लेकिन 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। चीन का आक्रमण जवाहरलाल नेहरू के लिए एक बड़ा झटका था और शायद इसी वजह से उनकी मौत भी हुई। नृपेंद्र अभिषेक नृप

डॉक्टर अम्बेडकर भारत के अकेले बड़े नेता थे जो नेहरू और चीन की दोस्ती की खुली आलोचना किया करते थे। अम्बेडकर ने कहा था कि भारत को वामपंथी तानाशाही और संसदीय लोकतंत्र में से किसी एक को चुनना चाहिए। उन्होंने पूछा था कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता क्यों नहीं मिली? प्रधानमंत्री नेहरू ने इसके लिए क्यों नहीं प्रयास किए? पंचशील नीति पर निशाना साधते हुए अम्बेडकर ने कहा था कि अगर माओ को पंचशील पर थोड़ा भी भरोसा होता तो वे अपने ही देश में बौद्धों के साथ अलग तरह का व्यवहार क्यों करते। उन्होंने अपने देश के ही बौद्धों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। अफ़सोस यह कि नेहरू ने कई मुद्दों पर अम्बेडकर जैसे विद्वान और पटेल जैसे महान प्रशासक की बात नहीं सुनी, जिसका खामियाजा हमारा देश आज तक भुगत रहा है। विदेश विभाग पंडित नेहरू ने अपने कार्यक्षेत्र में ही रखा था, परंतु कई बार उपप्रधानमंत्री होने के नाते कैबिनेट की विदेश विभाग समिति में सरदार पटेल को भी शामिल किया जाता. सरदार पटेल की दूरदर्शिता का लाभ यदि उस समय लिया जाता तो अनेक वर्तमान समस्याओं का जन्म ही नहीं होता । पटेल ने 1950 में पंडित नेहरू को लिखे एक पत्र में चीन तथा उसकी तिब्ब्त के प्रति नीति से सावधान रहने को कहा था। अपने पत्र में पटेल ने चीन को भावी शत्रु तक कह दिया था ।लेकिन, नेहरु किसी की सुनते ही कहां थे। नेहरू हमेसा की तरह संकट को झेलते और सीखते हुए इस दुनिया को अलविदा कह दिए। उन्होंने कहा था -- "जब भी हमारे सामने संकट और गतिरोध आते है, उनसे हमें एक फायदा तो होता है कि वे हमें सोचने पर मजबूर करते है।"


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--- नृपेंद्र अभिषेक नृप