हाशिए की जीवन को ज़ुबान देती चम्पारण के संतोष पटेल की कविता संग्रह 'जारी है लड़ाई'

संतोष पटेल शताब्दियों से वंचित और प्रताड़ित दलितों की सच्चाई को शब्दबद्ध करते हैं। 'खाली करो जंगल' कविता में आदिवासियों की पीड़ा का वर्णन किया गया है। कवि ने आदिवासियों के नाम पर सरकारी फंड को लूटने वाले एनजीओ पर करारा प्रहार किया है-

हाशिए की जीवन को ज़ुबान देती चम्पारण के संतोष पटेल  की कविता  संग्रह 'जारी है लड़ाई'

युवा कवि संतोष पटेल की पहली हिंदी कविता संग्रह 'जारी है लड़ाई' नवजागरण प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुई है। संग्रह में कुल 58 कविताएं हैं। संतोष पटेल जारी है लड़ाई में हाशिये पर जी रहे लोगों की आवाज बनते हैं। संग्रह के अधिकांश कविताएं इन्हीं की पीड़ा को दर्ज करती है। नवदलित, क्या यह अपराध नहीं है, एक शब्द आदि कई कविताओं में दलित समाज की वास्तविकता को उजागर किया गया है।' क्या यह अपराध नहीं है' की पंक्तियां देखिए-


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'कुएँ से पानी लाना
 अपराध ही तो था
 घोड़ी चढ़ बारात लाना 
तब भी अपराध था 
अभी अपराध है'



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 संतोष पटेल शताब्दियों से वंचित और प्रताड़ित दलितों की सच्चाई को शब्दबद्ध करते हैं। 'खाली करो जंगल' कविता में आदिवासियों की पीड़ा का वर्णन किया गया है। कवि ने आदिवासियों के नाम पर सरकारी फंड को लूटने वाले एनजीओ पर करारा प्रहार किया है-

 तुम्हारे घरों में बनकर गुलाम
 तुम्हारे एनजीओ की का धंधा चमकाने
 जिनकी तस्वीर अपनी एनुअल रिपोर्ट में छाप कर
पाते हो दुनिया में आवर्ड



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जारी है लड़ाई में शोषितों के अलावा अलग मिजाज की भी कविताएं हैं।  'फिर तुम ही जनों' में मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों के मंदिर प्रवेश के रोकपर मठाधीशों से सवाल कर स्त्री का  समर्थन करते हैं। 'गायब है' में कवि  सरकारी पाखंड को बखूबी व्यक्त करता है-


हाशिए की जीवन को ज़ुबान देती चम्पारण के संतोष पटेल...

गायब है बेरोजगारी का डाटा
सरकारी वेबसाइट से 
नेता जी के बाइट से।



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 'लाचार' कविता आम आदमी के दुख दर्द को उजागर करती है तो 'प्रेम करना इतना आसान नहीं है' में प्रेम की वास्तविकता का उल्लेख किया गया है। 

संग्रह में राजनीति के परिपेक्ष में कतिपय कविताएं है। 'रैली' और 'रेट तय है' इस दृष्टि से पढ़ी जा सकती है। 'रेट तय है'  में चुनाव में आम आदमी को पैसा देकर वोट करवाने की राजनीतिक पार्टियों की चाल का खुलासा किया गया है -

चुनाव आते ही कर दिया जाता है रेट तय
एक छोटी सभा के लिए तीन सौ
कॉलोनी में पदयात्रा के चार सौ
रामलीला मैदान में जाने का पांच सौ

'एक गिरमिटिया का हिन्दू बन जाना' कविता में गिरमिटिया के बहाने भाषा और जाति पर सवाल उठाए गए हैं। 
भारत की आजादी के इतने सालों के बाद भी भारत के दलितों की हालात में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। वे अब भी प्रताड़ित और शोषित किए जा रहे हैं। संतोष पटेल जानते हैं कि यह लड़ाई आसान नहीं है। संग्रह की अंतिम कविता 'जीत अंततोगत्वा हमारी होगी' में कवि  आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं कि आखिर उनकी जीत होगी। वे हर इकाई से लड़ने के लिए तैयार हैं जिन्होंने इन्हें दबा या रखा है सालों से।'जारी है लड़ाई' पठनीय संग्रह है इस कविता संग्रह की हिंदी कविता में स्वागत किया जाना चाहिए।


- डॉ सन्तोष अलेक्स, केरल
(समीक्षक डॉ सन्तोष एलेक्स की हिन्दी, अंग्रेजी एवं मलयालम में कुल मिलाकर  42 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।इसमें अनुवाद, कविता एवं आलोचना शामिल हैं।)