सांप्रदायिकता के चूल्हे पर पकी है नई शिक्षा नीति 2020 की रोटी। कैसे?

सांप्रदायिकता के चूल्हे पर पकी है नई शिक्षा नीति 2020 की रोटी।  कैसे?
सांप्रदायिकता के चूल्हे पर पकी है नई शिक्षा नीति 2020 की रोटी।  कैसे?

 


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स्वीकारोक्ति है। हिंदूवादी संगठन भारतीय शिक्षा मंडल (RSS की संस्था) के प्रवक्ता केजी सुरेश का कि नई शिक्षा नीति 2020 में "किसी-न-किसी रूप में हमारी 60-70% माँगों को शामिल किया गया है।" केजी सुरेश के अनुसार "हमने 2018 में एक सम्मेलन का आयोजन किया था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शरीक हुए थे। हमने एक राय से मंत्रालय का नाम बदलने की माँग की थी। नई शिक्षा नीति हमारी माँगों का प्रतिफल है।" वहीं दूसरे हिंदूवादी संगठन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के महासचिव ने भी इसका स्वागत करते हुए कहा है कि "इस नीति से देश और यहाँ के बच्चों का फायदा होगा, इसलिये हमने इसका स्वागत किया है।"


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लेकिन यह तो कथन है। किसी के समर्थन-विरोध, प्रसन्नता-अप्रसन्नता से इस नीति की सांप्रदायिकता कहाँ साबित होती है?

प्रसन्नता-अप्रसन्नता से नहीं, बल्कि हिंदूवादी संगठनों के साथ की गई बैठकों और फिर उनके एजेंडा को इस नीति में शामिल करने से इसकी सांप्रदायिकता साबित होती है।


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सांप्रदायिक संगठनों के साथ की गई मंत्रणाओं का विवरण देखिये। मंत्रालय की कमान संभालने के समय प्रकाश जावड़ेकर ने विद्या भारती, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ,भारतीय शिक्षण मंडल,संस्कृत भारती, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास आदि संस्थाओं के साथ बन्द कमरे में अनेक बैठकें कीं। ....... इस शिक्षा नीति पर सरकार को सुझाव देने के लिए दीनानाथ बत्रा द्वारा स्थापित शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने 40 बड़े सेमिनार और बैठकों का आयोजन करके अपनी अभिरुचि और भूमिका दिखाई। ....... 2018 में भारतीय शिक्षा मंडल के द्वारा आयोजित शिक्षा में बदलाव विषयक विमर्श में प्रकाश जावड़ेकर शामिल हुए। इसमें विभाग का नाम बदलना सबसे महत्वपूर्ण विषय था। ...... 2019 में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के 'ज्ञान उत्सव 2076' सम्मेलन में मोहन भागवत, रामदेव आदि के साथ रमेश पोखरियाल निशंक भी शामिल हुए थे। आदि-आदि।


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तो वे कौन-कौन प्रमुख बातें हैं, जो उपर्युक्त हिन्दू संगठनों के दवाब के कारण शिक्षा नीति 2020 में समाहित की गई हैं?


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विभाग का नाम बदलना सर्वप्रमुख बात है, जिसकी माँग अनेक हिंदू संगठन कर रहे थे। ..... वोकेशनल एजुकेशन आरएसएस की शुरू से सोच रही है। उसकी इस सोच को शिक्षा नीति में प्रमुखता से शामिल करके वर्ग 6 से ही घरेलू धंधों के लिए कम कीमत के कुशल मजदूर तैयार किये जायेंगे। ....... 2019 के दस्तावेज में पूरे देश के लिए हिंदी और अंग्रेजी माध्यम रखने की बात इन संगठनों के दवाब के कारण ही की गई थी। परंतु दक्षिण भारत में हुए तीव्र विरोध के कारण 5वीं तक मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान लाया गया। इस नए बदलाव में भी इन संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। .... केजी सुरेश के अनुसार नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के प्रावधान में उन्हीं की सहमति है। ....... और, सबसे बड़ी बात कि पूरी शिक्षा नीति में जिस प्राचीन संस्कृति, परंपरा, वैदिक गणित, दर्शन आदि को अपनाने की बात जगह-जगह कही गई है, वह भी इन हिंदूवादी संगठनों की ही देन है। भारतीय शिक्षा मंडल ने 'करीकुलर फ़ॉर आईडिया ऑफ इंडिया' का अलग अनुभाग बनाने का सुझाव दिया था। वह अलग तो नहीं बना, लेकिन पूरी नीति की आत्मा में वह समाहित है।

तो चलिए, ॐ भर्भुवः स्व: .... का जप करते हुए विद्यालय जाते हुए और हाथ में छेनी-हथौड़ी लेकर निकलते हुए भावी बच्चों के बल पर 'विश्वश्रमिक' बनते भारत को देखने के लिए कलेजा थामकर प्रतीक्षा करते हैं!