पूर्वी चम्पारण: मसूर की विकसित नई किस्म सौ दिनों में होगी तैयार

पूर्वी चम्पारण: मसूर की विकसित नई किस्म सौ दिनों में होगी तैयार

पीपराकोठी,पूर्वी चंपारण। स्थानीय आईसीआर द्वारा विकसित मसूर की नई किस्म मात्र सौ दिनों में तैयार होगा। पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के दलहन क्रांति को साकार करने के प्रयास को लेकर वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 में तैयार किया था। मसूर की इस नई प्रजाति का नाम पूसा एल 4717 रखा गया था। इसकी खासियत यह है कि मात्र 100 दिन में यह तैयार हो जाती और प्रति हेक्टेयर इसकी उत्पादकता भी 13 क्विंटल है। प्रोटीन और आयरन की प्रचुरता वाली मसूरी की इस प्रजाति को विकसित करने में कई सालों से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कृषि वैज्ञानिक लगे हुए थे। सेंट्रल जोन और पानी की कमी वाले असिंचित क्षेत्रों के लिए इस प्रजाति की खेती बेहतर रही है।


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मसूर की खेती के बारे में जानकारी देते हुए केविके प्रमुख डॉ.अरबिंद कुमार सिंह ने बताया कि किसानों के लिए आय का बेहतर किस्म साबित हो रहा है। बताया कि मसूर की खेती के लिए दोमट से भारी भूमि अधिक उपयुक्त होती है। मसूर की अगेती किस्म की बुवाई के लिए 40-60 किलोग्राम और पिछेती की बुवाई के लिए 55-75 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर जरूरतर होती है। मसूर की खेती के लिए बीजोउपचार भी जरूरी होता है। इसके लिए 10 किलोग्राम बीज को मसूर के एक पैकेट को 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर से उपचारित करके बोना चाहिए। मसूर में सिंचाई की कम जरूरत पड़ती है लेकिन इसके बाद भी इसकी पहली सिंचाई फूल आने से पहले करनी चाहिए। धान के खेतों में बोई गई मसूर की फसल में सिंचाई फली बनने के समय करनी चाहिए।


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