मोतिहारी : शिक्षा का मंदिर बना पैसा कमाने का जरिया, मूल उद्देश्य से भटकता शिक्षा क्षेत्र
चम्पारण टुडे /पूर्वी चंपारण "शिक्षा एक सेवा है, व्यापार नहीं", यह सिद्धांत आज के समय में सिर्फ किताबों तक सिमट कर रह गया है। जिन स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों को ज्ञान की धरती, शिक्षा का धाम, विद्या का स्थान, ज्ञान का प्रकाश, ज्ञान का स्रोत, ज्ञान का मंदिर कहा जाता था, वे आज तेजी से 'कमाई के केंद्र' बनते जा रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों, खासकर ग्रामीण इलाकों .......
चम्पारण टुडे /पूर्वी चंपारण
"शिक्षा एक सेवा है, व्यापार नहीं", यह सिद्धांत आज के समय में सिर्फ किताबों तक सिमट कर रह गया है। जिन स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों को ज्ञान की धरती, शिक्षा का धाम, विद्या का स्थान, ज्ञान का प्रकाश, ज्ञान का स्रोत, ज्ञान का मंदिर कहा जाता था, वे आज तेजी से 'कमाई के केंद्र' बनते जा रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों, खासकर ग्रामीण इलाकों से लेकर बड़े शहरों तक, शिक्षा क्षेत्र में पैसे कमाने की प्रवृत्ति गहरी जड़ें जमा चुकी है।
फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी :
निजी स्कूलों ने ट्यूशन फीस, एडमिशन फीस, डेवलपमेंट चार्ज और विभिन्न मदों के नाम पर अभिभावकों पर आर्थिक बोझ डाल दिया है। कई संस्थान तो एडमिशन के लिए 'डोनेशन' की खुली मांग करते हैं, जो कानूनी रूप से गलत है, लेकिन फिर भी धड़ल्ले से चल रहा है।
पढ़ाई से ज्यादा दिखावे पर जोर :
आजकल स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता से अधिक ध्यान स्कूल बिल्डिंग की चमक-दमक, फैंसी यूनिफॉर्म, महंगे इवेंट्स और पब्लिसिटी पर दिया जा रहा है। स्कूलों का मुख्य फोकस बच्चों को बेहतर इंसान बनाने की बजाय अपने ब्रांड वैल्यू बढ़ाने पर होता दिख रहा है।
ग्रामीण क्षेत्र भी नहीं बचे :
पूर्वी चंपारण जैसे ग्रामीण इलाकों में भी अब शिक्षा एक बड़ा व्यवसाय बन चुकी है। कई छोटे-छोटे प्राइवेट स्कूल खुले हैं, जो बिना मान्यता और बुनियादी सुविधाओं के, मोटी फीस वसूल रहे हैं। मोतिहारी, रक्सौल, घोड़ासहन सहित अन्य जगहों पर किताबें और यूनिफॉर्म भी केवल स्कूल में अथवा स्कूल द्वारा निर्धारित दुकानों से ही खरीदी जाती हैं, जिससे अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
सरकारी स्कूलों की स्थिति भी चिंताजनक :
जहां एक ओर निजी स्कूल पैसे बनाने में लगे हैं, वहीं सरकारी स्कूलों की स्थिति भी दयनीय है। शिक्षक समय पर स्कूल नहीं पहुंचते, पढ़ाई का स्तर गिरता जा रहा है और सरकारी सुविधाओं का सही ढंग से उपयोग नहीं हो रहा। परिणामस्वरूप, गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा से वंचित होना पड़ता है। हलाकि अब सरकारी विद्यालयों में धीरे धीरे सुधर दिखना शुरू हो गया है।
शिक्षा विभाग और प्रशासन की निष्क्रियता :
हालांकि समय-समय पर शिक्षा विभाग द्वारा निरीक्षण अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका असर न के बराबर दिखता है। अक्सर शिकायतें दबा दी जाती हैं या औपचारिक कार्रवाई कर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है या यूँ कहे तो प्राइवेट स्कूलों पर इनका नियंत्रण न के बराबर है या फिर चमक चौंध में ये भी चौंधिया जाते हैं।
समाज में बढ़ रही असमानता :
जब शिक्षा को व्यापार बना दिया जाता है, तब समाज में अमीर और गरीब के बीच की खाई और गहरी हो जाती है। उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा सिर्फ पैसे वालों तक सीमित हो जाती है, जिससे एक बड़ा वर्ग पिछड़ जाता है।
समाधान की जरूरत :
आज जरूरत है कि शिक्षा को फिर से एक सेवा का दर्जा दिया जाए। फीस नियंत्रण, शिक्षण गुणवत्ता सुधारने, सरकारी स्कूलों को सशक्त बनाने और शिक्षा में पारदर्शिता लाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। प्रशासन को चाहिए कि वह निजी स्कूलों की मनमानी पर सख्त कार्रवाई करे और शिक्षा के मूल उद्देश्य, "ज्ञान का प्रसार" को फिर से जीवित करे।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0