बसंती पंचमी 2026, ज्ञान, नई ऊर्जा और समकालीन पूजा-पाठ का पावन पर्व

23 जनवरी 2026 को देश भर में बसंती पंचमी का उत्सव धूमधाम से मनाया जाना है। यह वही पावन दिन है जब गणमान्य हिन्दू परंपरा में माता सरस्वती, विद्या, संगीत, कला और बुद्धि की देवी, की पूजा का विशेष विधान है। यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर पड़ता है और वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है।

Jan 19, 2026 - 12:05
Jan 19, 2026 - 12:06
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बसंती पंचमी 2026, ज्ञान, नई ऊर्जा और समकालीन पूजा-पाठ का पावन पर्व

23 जनवरी 2026 को देश भर में बसंती पंचमी का उत्सव धूमधाम से मनाया जाना है। यह वही पावन दिन है जब गणमान्य हिन्दू परंपरा में माता सरस्वती, विद्या, संगीत, कला और बुद्धि की देवी, की पूजा का विशेष विधान है। यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर पड़ता है और वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक व सांस्कृतिक महत्त्व :
हिंदू धर्म में बसंती पंचमी का महत्व केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत मात्र नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, शिक्षा और रचनात्मकता का उत्सव भी है। लोग विशेष रूप से इस दिन पीले रंग का वस्त्र धारण करते हैं, जो उत्साह, सकारात्मकता और वसंत की ऊर्जा का प्रतीक है। पूजा स्थल में पीले पुष्प, पीली मिठाई और पीले प्रसाद का उपयोग किया जाता है।

छात्र व माता सरस्वती के भक्त सुबह जल्दी उठकर अपने घरों, विद्यालयों और मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। सुबह का शुभ मुहूर्त प्रातःकाल लगभग 07:15 बजे से दोपहर तक माना जाता है, जब विधि-पूर्वक पूजन का आयोजन सर्वोत्तम रहता है।

वर्तमान परिवेश में पूजा-पाठ एवं आयोजन :
इस वर्ष 23 जनवरी को देश के अनेक हिस्सों में सुबह से ही पूजा-समारोह मनाया जाना है। आज के विद्यालयों और कॉलेजों में छात्रों द्वारा सरस्वती पूजा की विशेष रस्मों के साथ पुस्तकों और वाद्य यंत्रों का पूजन किया जाता है। कई स्थानों पर समुदाय स्तर पर पंडाल और पूजा स्थल सजाये जाते हैं, जहाँ स्थानीय श्रद्धालु सामूहिक वंदना और भजन-कीर्तन में भाग लेते हैं। शहरों और कस्बों में युवा एवं बुजुर्ग, दोनों ही पीढ़ियाँ ज्ञान और शिक्षा के महत्व को उजागर करते हुए माँ सरस्वती से प्रेरणा लेते हैं।

चंदा वसूली और सामाजिक प्रयास :
कुछ समुदायों और मंदिर समितियों ने इस अवसर पर पूजा एवं जगरण के आयोजन के लिए स्वयंसेवकों के माध्यम से चंदा एकत्रित करना भी शुरू कर दिया है। यह चंदा पूजा सामग्री की व्यवस्था, प्रसाद वितरण और स्थानीय धार्मिक व सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन में उपयोग किया जाता है।

हालाँकि, कई जगह जागरूक नागरिकों और युवाओं ने इस चंदा वसूली में पारदर्शिता और सही उपयोग पर जोर दिया है। उन्होंने आग्रह किया है कि चंदा केवल पूजा-समारोह और सामाजिक भलाई के हेतुओं पर ही खर्च किया जाये, न कि अत्यधिक सजावट या व्यय पर। इस बाबत कई समितियाँ अपने खर्चों को सार्वजनिक रूप से साझा भी कर रही हैं, ताकि लोगों का विश्वास बना रहे और उत्सव का आध्यात्मिक उद्देश्य प्राथमिकता में रहे।

कुछ युवको व बच्चो द्वारा रास्ते में बांस बल्ला लगाकर भी जबरन चंदा वसूलने का काम किया जाता है, जो गलत है। धर्मावलम्बी व समाजसेवी ऐसे करने से मना भी करते हैं। अब तो जबरन चंदा वसूली पर प्रशासन भी सख्त है।  

आधुनिक संदर्भ एवं सामाजिक संदेश :
आज के डिजिटल युग में, बसंत पंचमी का उत्सव केवल पारंपरिक पूजा तक सीमित नहीं रह गया है। सोशल मीडिया पर भक्तगण माँ सरस्वती की छवियों, गायत्री मंत्रों और ज्ञान-विज्ञान पर आधारित संदेशों को साझा करते हैं, जिससे पूरे देश में ज्ञान के प्रति सकारात्मक भावना का संचार होता है। छात्रों द्वारा अक्षरारम्भ, हॉफ-सत्र के शुभारंभ और नए सीखने-सिखाने के कार्यक्रम भी इस दिन विशेष रूप से आयोजित किये जाते हैं।

समापन विचार :
बसंती पंचमी न सिर्फ एक पारंपरिक पूजा-परंपरा है बल्कि यह आध्यात्मिक जागरण, सामाजिक एकता और शिक्षा-संचार का प्रतीक भी है। 23 जनवरी 2026 को मनायी जा रही सरस्वती पूजा में श्रद्धा, अनुशासन और आधुनिक सामाजिक भावनाओं का सुंदर मिश्रण देखने को मिलने, पूजा-पाठ के साथ ही समाज के समग्र विकास और सकारात्मकता को भी प्रमुखता दिए जाने की उम्मीद की जा रही है। 
(आर0 एस0)

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