श्रद्धांजलिः डॉ. श्रवणकुमार गोस्वामी को आखिरी जोहार, 81 वर्षीय हिंदी साहित्यकार का निधन ।
श्रद्धांजलिः डॉ. श्रवणकुमार गोस्वामी को आखिरी जोहार, 81 वर्षीय हिंदी साहित्यकार का निधन
डॉ. श्रवणकुमार गोस्वामी सबसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने ‘नागपुरी भाषा और साहित्य' पर शोध किया था. उनका पहला उपन्यास था - जंगलतंत्रम. इसी उपन्यास को पहला राधाकृष्ण सम्मान मिला था.
रांची. डॉ. श्रवणकुमार गोस्वामी नहीं रहे. हिंदी साहित्य में दर्जनों उपन्यास का योगदान देने वाले गोस्वामी का आज निधन हो गया. वे 81 साल के थे और बीमार चल रहे थे. उनके जानने वाले कहते हैं कि कोरोना (COVID-19) महामारी ने उन्हें अंतिम समय में चिकित्सा सुविधाओं से बिल्कुल वंचित कर रखा था. उनका जाना हिंदी साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है. हालांकि यह भी सच है कि हिंदी साहित्य जगत ने इस झारखंडी लेखक को वह सम्मान कभी नहीं दिया जिसके वे हकदार थे. वे सबसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने ‘नागपुरी भाषा और साहित्य' पर शोध किया था. उनका पहला उपन्यास था - जंगलतंत्रम. इसी उपन्यास को पहला राधाकृष्ण सम्मान मिला था.
यह बात 1992 की है जब अविभाजित बिहार में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया था. पूरे बिहार से कुल 30 नाट्य कलाकारों का चयन हुआ था. नेतरहाट में चल रहे इस प्रशिक्षण शिविर में कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम का मंचन नागपुरी में किया जाना तय हुआ. तब मोहन राकेश की हिंदी स्क्रिप्ट से नाटक को नागपुरी भाषा में बदलने की शुरुआती जिम्मेदारी श्रवणकुमार गोस्वामी को ही सौंपी गई थी. बाद में नागपुरी की इस स्क्रिप्ट पर राकेश रमण ने भी महत्वपूर्ण काम किया. इस नाटक को नागपुरी धुन से संवारने का बीड़ा मुकुंद नायक ने उठाया था.
यह सब ध्यान दिलाने का एकमात्र मकसद यह कि झारखंड के इस लेखक ने हिंदी साहित्य को जितना दिया, साहित्य की दुनिया उन्हें वह सम्मान देने से चूक गई जिसके हकदार डॉ श्रवणकुमार गोस्वामी थे. उनका जाना हिंदी साहित्य के लिए जितनी बड़ी क्षति है, झारखंड के लिए यह नुकसान कहीं ज्यादा बड़ा है.
यह सब ध्यान दिलाने का एकमात्र मकसद यह कि झारखंड के इस लेखक ने हिंदी साहित्य को जितना दिया, साहित्य की दुनिया उन्हें वह सम्मान देने से चूक गई जिसके हकदार डॉ श्रवणकुमार गोस्वामी थे. उनका जाना हिंदी साहित्य के लिए जितनी बड़ी क्षति है, झारखंड के लिए यह नुकसान कहीं ज्यादा बड़ा है.
ख्यात कथाकार डॉ. श्रवणकुमार गोस्वामी वैचारिक निष्ठा के लिहाज से प्रेमचंद और राधाकृष्ण की परंपरा के लेखक थे और प्रकाशित पुस्तकों के संख्या बल की दृष्टि से द्वारका प्रसाद और सिद्धनाथ कुमार की कतार में खड़े थे. ‘लौह कपाट के पीछे‘ जैसे यात्रावृत्त के अलावे दो कहानी संकलन, ‘चक्रव्यूह‘ जैसे सुचर्चित उपन्यास के साथ अन्य ग्यारह उपन्यास, तीन नाटक, शोध-आलोचना के चार ग्रंथ, डॉ. बुल्के स्मृति ग्रंथ‘ और मुंडारी रामचरित मानस (टीका) का संपादन. हर स्मृतिशेष लेखक की तरह पत्र-पत्रिकाओं में उनके प्रकाशित आलेखों की संख्या बड़ी है. राधाकृष्ण पुरस्कार की निर्णायक समिति के सदस्य के बतौर लगभग 25 वर्षों तक उन्होंने एक ऐतिहासिक दायित्व का निर्वाह किया था. झारखंड की हिन्दी परम्परा अपने इस कलम के सपूत को हमेशा याद रखेगी.
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