ग़लतफ़हमी - ऋषिकेश सारस्वत
गलतफहमी — कभी-कभी एक छोटी-सी गलतफहमी रिश्तों के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर देती है, जैसे उजाले के बीच घना कोहरा छा जाए। लेकिन शांत मन, समझदारी और खुले संवाद से उलझी हुई गाँठों को फिर से सुलझाया जा सकता है। यह कविता रिश्तों में संवाद, विश्वास और समझ की अहमियत को खूबसूरती से व्यक्त करती है। शिकायतों को पीछे छोड़कर, रिश्तों में फिर से प्रेम और विश्वास का उजाला भरने की एक भावपूर्ण कोशिश।
कभी गलतफहमियां,
रिश्तों में दीवार बन जाए,
मानो सूर्य की रोशनी के बीच
घना कोहरा छा जाए।
बहती नदियों के रास्ते में
जैसे कोई चट्टान आ जाए,
या कोई सीधा सा धागा
अचानक उलझ जाए।
तब शांत रहकर, एकाग्रचित होकर,
उस उलझी हुई गाँठ को
बड़ी संजीदगी से खोलना।
बहती हुई हवाओं की तरह,
संवादों को खुला आसमान देना।
ताकि इस अनंत ब्रह्मांड में,
शिकायतें धूल बनकर उड़ सकें,
सुबह की पहली किरण के साथ,
तब अंधेरे कमरे की खिड़की खोलना,
आने देना उस दिव्य प्रकाश को
तब रिश्तों को नया आयाम देना।
© ऋषिकेश सारस्वत
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