घोड़ासहन : आकाश कुमार को पटना हाईकोर्ट से राहत, केविवि की कार्रवाई को हाईकोर्ट ने बताया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत
चम्पारण टुडे /मोतिहारी /पूर्वी चम्पारण
मोतिहारी। महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (केविवि) के मीडिया अध्ययन विभाग के विद्यार्थी आकाश कुमार के विश्वविद्यालय से निष्कासन के मामले में पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 14 अगस्त 2024 के निष्कासन आदेश को रद्द कर दिया है। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, न्यायमूर्ति हरीश कुमार की अदालत ने 21 सितंबर 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि अनिश्चित अवधि के लिए किया गया निष्कासन प्रथम दृष्टया विश्वविद्यालय के अधिनियम एवं अध्यादेश के तहत अधिकृत नहीं था। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई निष्पक्षता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती और इसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन हुआ।
अनिश्चित अवधि का निष्कासन ‘शैक्षणिक मौत’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है :-
फैसले में हाईकोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक पूर्व निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी विद्यार्थी को अनिश्चित या निर्दिष्ट अवधि के लिए निष्कासित किया जाना उसके लिए ‘शैक्षणिक मौत’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसी कार्रवाई से विद्यार्थी की शिक्षा और भविष्य की शैक्षणिक प्रगति पर गंभीर एवं स्थायी प्रभाव पड़ सकता है। अदालत ने ऐसे मामलों में निष्कासन जैसी कठोर कार्रवाई की वैधानिकता और समानता के पहलू पर विचार किए जाने की आवश्यकता पर भी गौर किया।
सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भी कोर्ट की टिप्पणी :-
प्रेस विज्ञप्ति में दी गई जानकारी के अनुसार, आकाश कुमार द्वारा सोशल मीडिया पर दिनेश हुड्डा की नियुक्ति एवं प्रमोशन प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से संबंधित वीडियो पोस्ट किए जाने के मामले को भी अदालत के समक्ष उठाया गया था। आदेश में आकाश कुमार को व्हिसल ब्लोअर के रूप में संदर्भित करते हुए सोशल मीडिया पर उक्त विषय से संबंधित वीडियो पोस्ट करने को अनुशासनहीनता के रूप में स्वीकार नहीं किया गया। मामले में अदालत की टिप्पणी का केंद्र यह था कि नियमों अथवा नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित मुद्दों को उठाने की स्थिति में विद्यार्थी के विरुद्ध की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई भी विधि और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।
शो-कॉज नोटिस और जांच रिपोर्ट को लेकर उठे सवाल :-
पटना हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत कश्यप के अनुसार, उच्च न्यायालय ने अपने लिखित आदेश में कहा कि अनिश्चित काल के लिए निष्कासन जैसी कठोर कार्रवाई करने से पहले याचिकाकर्ता को ऐसा विशिष्ट कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice) नहीं दिया गया, जिसमें उससे यह स्पष्ट रूप से पूछा जाता कि उसे विश्वविद्यालय से क्यों न निष्कासित किया जाए। अधिवक्ता के अनुसार, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता को ऐसी कोई विशिष्ट जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराए जाने का उल्लेख नहीं है, जिसके आधार पर उसे निष्कासन की सजा दिए जाने के कारणों को स्पष्ट रूप से समझने और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता। अदालत ने इन परिस्थितियों को देखते हुए निष्कासन आदेश को उचित नहीं माना और 14 अगस्त 2024 के आदेश को रद्द कर दिया।

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