अंतर्मुखी - ऋषिकेश सारस्वत

ऋषिकेश सारस्वत की कविता "हाँ, मैं अंतर्मुखी हूँ" एक अंतर्मुखी (Introvert) व्यक्ति के समृद्ध आंतरिक संसार और उसकी खामोशी के पीछे छिपी गहराई का एक अत्यंत संवेदनशील चित्रण है। यह कविता समाज की उस रूढ़िवादी सोच को चुनौती देती है जो शांत रहने या खुद को खुलकर व्यक्त न कर पाने को अहंकार या कमजोरी मान लेती है। कवि स्पष्ट करते हैं कि अंतर्मुखी व्यक्ति अज्ञानी नहीं होते, बल्कि वे गहरे पर्यवेक्षक होते हैं जो बोलने से पहले शब्दों के प्रभाव और दूसरों की भावनाओं का पूरा आकलन करते हैं। अंततः, यह रचना एक शक्तिशाली संदेश देती है कि अंतर्मुखता कोई दोष नहीं, बल्कि गहन संवेदनशीलता, आत्म-जागरूकता और मानसिक परिपक्वता का प्रतीक है, इसलिए किसी को भी उसकी खामोशी से नहीं आँका जाना चाहिए।

Oct 05, 2026 - 16:22
0 22
अंतर्मुखी - ऋषिकेश सारस्वत

मैं समाज में फिट नहीं बैठता,
कभी अहंकारी होने का
तमगा भी मिल जाता है।
किसी के सामने
खुद को व्यक्त नहीं कर पाता हूँ,
शायद इसलिए
लोग मुझे समझ नहीं पाते...
हाँ, मैं अंतर्मुखी हूँ।

बोलता बहुत कम हूँ,
समझता कहीं ज्यादा हूँ।
भावनाओं को शब्द देने से पहले
उन्हें गहराई से महसूस करता हूँ।
हर बात को कह देने की बजाय
कई बार खामोशी में जीता हूँ,
हाँ, मैं अंतर्मुखी हूँ।

बोलने के लिए
शब्दों की कोई कमी नहीं,
बोले गए शब्दों के प्रभाव का
पहले आकलन करता हूँ।
ऐसा नहीं कि
तुम्हारे सवालों का जवाब नहीं दे सकता,
बस सोचता हूँ—
कहीं मेरा जवाब
तुम्हारे अहं को चोट न पहुँचा दे।
मैं चुप जरूर रहता हूँ,
मगर अनजान नहीं हूँ।
शायद मेरी खामोशी को
तुम मेरी कमजोरी समझते हो,
पर सच तो यह है—
मैं बोलने से पहले
समझने वाला इंसान हूँ।

इसलिए मुझे
मेरी खामोशी से मत आँको,
मेरी चुप्पी को अहंकार मत समझो।
मैं बस दुनिया से थोड़ा अलग हूँ,
अपने भीतर की दुनिया में
कुछ ज्यादा ही रहता हूँ...
हाँ, मैं अंतर्मुखी हूँ।
© ऋषिकेश सारस्वत

What's Your Reaction?

Like Like 2
Dislike Dislike 0
Love Love 2
Funny Funny 0
Wow Wow 2
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User