कविता: अखबार का अस्तित्व: ऋषिकेश सारस्वत
अखबार का अस्तित्व?
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कवि ऋषिकेश सारस्वत 'साहित्य सुमन' |
क्या आज भी
तुम्हारा अस्तित्व कायम है!
या,
सिर्फ मायने बदल गए है!
क्या आज भी
तुम बेबस लोगों की आवाज हो!
या,
पूंजीपतियों के गुलाम हो!
क्या आज भी
तुम्हे 'विद्यार्थी' जैसे लोग चलाते है!
या,
सत्ता के चाटूकार!
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